मोरोझको (Morozko) - रूस की एक अद्भुत लोक कथा
बहुत समय पहले की बात है, रूस के एक छोटे से गाँव में एक बूढ़ा आदमी अपनी दूसरी पत्नी के साथ रहता था। उस बूढ़े आदमी की पहली पत्नी से एक बेटी थी, जिसका नाम नास्तेंका था। और उसकी दूसरी पत्नी (यानी बुढ़िया) की भी अपनी एक बेटी थी, जिसका नाम मार्फुशा था।
नास्तेंका बहुत ही प्यारी, भोली और मेहनती लड़की थी। वह सुबह सूरज उगने से पहले उठ जाती थी। वह घर में झाड़ू लगाती, फर्श पोछती, मुर्गियों को दाना डालती, गाय का दूध निकालती और चूल्हे की आग जलाती थी। वह कभी किसी काम के लिए मना नहीं करती थी और हर समय उसके चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान रहती थी।
दूसरी ओर, मार्फुशा बहुत ही आलसी, लालची और चिड़चिड़ी थी। वह दिन भर नरम बिस्तर पर सोती रहती थी। जब उठती, तो बस मीठा-मीठा खाना खाती और आईने के सामने बैठकर अपने बालों में कंघी करती रहती थी।
नास्तेंका की सौतेली माँ बहुत ही क्रूर और भेदभाव करने वाली औरत थी। वह अपनी सगी बेटी मार्फुशा से तो बहुत प्यार करती थी, लेकिन अपनी सौतेली बेटी नास्तेंका से नफरत करती थी। वह नास्तेंका को दिन भर गालियाँ देती, ताने मारती और उसे घर के सबसे भारी और मुश्किल काम करने को देती। बेचारी नास्तेंका दिन भर बिना रुके काम करती, लेकिन फिर भी उसकी सौतेली माँ कभी खुश नहीं होती थी। वह बस हमेशा इसी ताक में रहती थी कि किस तरह नास्तेंका को घर से निकाल बाहर करे। बूढ़ा आदमी यह सब देखता था, लेकिन वह अपनी पत्नी से इतना डरता था कि कभी नास्तेंका के पक्ष में एक शब्द भी नहीं बोल पाता था।
जैसे-जैसे समय बीता, दोनों लड़कियाँ बड़ी हो गईं। नास्तेंका बड़ी होकर गाँव की सबसे सुंदर और सुशील लड़की बन गई। उसकी सुंदरता और उसके अच्छे स्वभाव की चर्चा पूरे गाँव में होने लगी। हर कोई नास्तेंका की तारीफ करता था। लेकिन मार्फुशा बड़ी होकर और भी बदसूरत और मोटी हो गई। उसका स्वभाव इतना बुरा था कि गाँव का कोई भी इंसान उससे सीधे मुँह बात करना पसंद नहीं करता था।
यह देखकर सौतेली माँ की जलन और नफरत सातवें आसमान पर पहुँच गई। उसे डर सताने लगा कि नास्तेंका की सुंदरता के आगे उसकी सगी बेटी मार्फुशा को कोई पसंद नहीं करेगा और उसकी शादी कभी नहीं हो पाएगी। उसने मन ही मन नास्तेंका से हमेशा के लिए छुटकारा पाने की एक बहुत ही खौफनाक योजना बनाई।
रूस में उन दिनों भयंकर सर्दियाँ पड़ रही थीं। बाहर इतनी बर्फ गिर रही थी कि पेड़-पौधे और रास्ते सब सफेद हो गए थे। हवा इतनी सर्द थी कि हड्डियाँ तक काँप जाएँ। ऐसी कड़कड़ाती ठंड में बाहर निकलना मौत को बुलावा देने के बराबर था।
एक दिन सौतेली माँ ने अपने पति को बुलाया और चिल्लाकर कहा, "मैं अब इस लड़की को अपने घर में एक पल भी बर्दाश्त नहीं कर सकती! तुम अभी के अभी अपनी गाड़ी तैयार करो। नास्तेंका को इसमें बिठाओ और इसे घने जंगल में ले जाकर छोड़ आओ। इसे किसी बहुत ऊँचे देवदार के पेड़ के नीचे छोड़ देना ताकि यह वहीं ठंड से जम कर मर जाए।"
यह सुनकर बूढ़ा आदमी बुरी तरह डर गया। "तुम यह क्या कह रही हो? यह मेरी अपनी बेटी है। इतनी भयानक ठंड में उसे जंगल में छोड़ना मतलब उसे जान से मारना है। मैं ऐसा पाप नहीं करूँगा!"
लेकिन बुढ़िया ने उसकी एक न सुनी। उसने बूढ़े को खूब खरी-खोटी सुनाई और कहा कि अगर उसने ऐसा नहीं किया, तो वह उसे भी घर से निकाल देगी। बूढ़ा बहुत कमज़ोर और लाचार था। वह रोता हुआ बाहर गया और उसने अपनी गाड़ी में घोड़ा जोत दिया।
उसने नास्तेंका को बाहर बुलाया। बेचारी नास्तेंका को समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है। वह अपनी फटी-पुरानी शॉल ओढ़कर गाड़ी में बैठ गई। बूढ़े ने भारी मन से घोड़े को जंगल की ओर हाँक दिया।
जंगल में चारों तरफ सन्नाटा था। सिर्फ हवा के चलने की डरावनी आवाज़ें आ रही थीं। बर्फ बहुत गहरी थी। बूढ़े ने अपनी गाड़ी एक बहुत बड़े और पुराने देवदार के पेड़ के पास रोकी। वह अपनी बेटी को कुछ नहीं बता पाया। वह बस रोते हुए नास्तेंका को गाड़ी से उतार कर उस पेड़ के नीचे बिठा गया और मुँह छिपाकर वापस गाँव की तरफ लौट गया।
नास्तेंका उस विशाल पेड़ के नीचे बर्फ पर अकेली बैठी थी। उसके पास गर्म कपड़े नहीं थे। वह ठंड से ठिठुर रही थी। उसके होंठ नीले पड़ गए थे और उसके दाँत किटकिटा रहे थे। वह अपने हाथों को रगड़ कर खुद को गर्म करने की कोशिश कर रही थी। वह जानती थी कि वह इस भयानक ठंड में ज़िंदा नहीं बच पाएगी, लेकिन उसने कोई शिकायत नहीं की और शांति से अपनी मौत का इंतज़ार करने लगी।
तभी उसे पेड़ों के बीच से एक आवाज़ सुनाई दी। कोई एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँग लगा रहा था, और जिसके गुज़रने से पेड़ों पर जमी बर्फ टूट कर नीचे गिर रही थी।
वह कोई और नहीं, बल्कि 'मोरोझको' (Morozko) यानी 'फादर फ्रॉस्ट' था। वह रूस की सर्दियों का देवता था, जिसका काम जंगलों और पहाड़ों में भयंकर ठंड और बर्फबारी लाना था। उसकी लंबी सफेद दाढ़ी थी और उसने बर्फ से बना एक चमचमाता हुआ जादुई लबादा पहना हुआ था।
मोरोझको छलाँग लगाता हुआ उसी देवदार के पेड़ पर आकर उतरा, जिसके नीचे नास्तेंका बैठी थी। उसने नीचे एक छोटी सी लड़की को ठंड से ठिठुरते हुए देखा। मोरोझको अपनी जादुई शक्तियों से ठंड को और बढ़ाने लगा। पेड़ की डालियों पर बर्फ जमने लगी।
मोरोझको पेड़ से नीचे उतरा और नास्तेंका के पास आकर अपनी भारी आवाज़ में पूछा, "क्या तुम्हें ठंड लग रही है, मेरी बच्ची? क्या तुम गर्म हो?"
नास्तेंका बहुत ही संस्कारी लड़की थी। उसने अपनी काँपती हुई आवाज़ को काबू में किया और बहुत प्यार से कहा, "नहीं दादाजी मोरोझको। मैं बिल्कुल ठीक हूँ। मुझे ठंड नहीं लग रही है।"
मोरोझको थोड़ा हैरान हुआ। उसने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके ठंड को और ज़्यादा कड़ा कर दिया। ठंडी हवा के झोंके और तेज़ हो गए और बर्फ के टुकड़े तीर की तरह चुभने लगे।
मोरोझको ने नास्तेंका के और करीब आकर फिर पूछा, "क्या अब तुम्हें ठंड लग रही है, प्यारी बच्ची? क्या तुम अब गर्म हो?"
नास्तेंका का पूरा शरीर सुन्न पड़ चुका था, लेकिन फिर भी उसने बहुत ही मीठे स्वर में जवाब दिया, "मैं ठीक हूँ, प्यारे दादाजी। मैं बिल्कुल गर्म हूँ।"
मोरोझको को यह देखकर बहुत अचंभा हुआ। इंसान हमेशा ठंड से शिकायत करते थे, लेकिन इस छोटी सी लड़की ने इतनी परेशानी में भी कोई शिकायत नहीं की और पूरे सम्मान के साथ बात की। मोरोझको ने तीसरी बार अपनी पूरी ताकत से सबसे भयानक बर्फीला तूफान ला दिया। हवा बर्फानी हो गई।
उसने नास्तेंका के चेहरे के बिल्कुल पास आकर तीसरी बार पूछा, "क्या मेरी बच्ची अब गर्म है? क्या तुम्हें अब ठंड महसूस हो रही है?"
नास्तेंका अब बोलने की हालत में भी नहीं थी। उसकी पलकों पर बर्फ जम चुकी थी। उसने अपनी आखिरी ताकत बटोरी और मुस्कुराते हुए कहा, "प्यारे दादाजी... मोरोझको... मैं बिल्कुल गर्म हूँ... आप चिंता मत कीजिए।" इतना कहते ही वह बेहोश होकर बर्फ पर गिर पड़ी।
नास्तेंका की इस दयालुता, धैर्य और सहनशीलता ने मोरोझको के कठोर दिल को पिघला दिया। मोरोझको को उस पर बहुत दया आ गई। उसने तुरंत अपना जादुई बर्फीला तूफान रोक दिया। उसने एक बहुत ही भारी, गर्म और कीमती फर (Fur) का कोट निकाला और उसे बेहोश नास्तेंका के ऊपर ओढ़ा दिया।
मोरोझको की जादुई गर्मी से नास्तेंका के शरीर में जान आ गई। उसने आँखें खोलीं तो देखा कि वह एक बेहद गर्म और मुलायम कोट के अंदर सुरक्षित है। मोरोझको उसके सामने मुस्कुराता हुआ खड़ा था।
"तुम बहुत ही अच्छी और नेक लड़की हो," मोरोझको ने कहा। "तुमने मेरी इतनी कठोर परीक्षा पास कर ली है और ज़रा भी शिकायत नहीं की। मैं तुम्हारे इस धैर्य और अच्छे स्वभाव का तुम्हें इनाम दूँगा।"
इतना कहकर मोरोझको ने एक बहुत बड़ा और भारी संदूक नास्तेंका के सामने रख दिया। उस संदूक के अंदर शुद्ध सोने के सिक्के, चाँदी के बर्तन, हीरे-मोती, और बहुत ही सुंदर और कीमती रेशमी कपड़े भरे हुए थे।
अगली सुबह, गाँव में सौतेली माँ घर में बैठी अपनी बेटी मार्फुशा के साथ स्वादिष्ट पैनकेक खा रही थी। उसने अपने पति से कहा, "जाओ, जाकर जंगल से अपनी उस लाडली बेटी की लाश उठा लाओ। अब तक तो वह जम कर बर्फ बन गई होगी।"
बूढ़ा आदमी रोता हुआ अपनी गाड़ी लेकर जंगल की ओर गया। उसे पक्का यकीन था कि वह अब अपनी बेटी को कभी ज़िंदा नहीं देख पाएगा।
घर पर बुढ़िया और मार्फुशा खुशियाँ मना रही थीं। घर के बाहर उनका एक छोटा सा कुत्ता बैठा था। कुत्ता अचानक ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा और इंसानों की तरह बोलने लगा, "भौ-भौ! बूढ़े की बेटी लौट रही है! बूढ़े की बेटी सोने और चाँदी के साथ लौट रही है! और बुढ़िया की बेटी से कोई शादी नहीं करेगा!"
सौतेली माँ को यह सुनकर बहुत गुस्सा आया। उसने कुत्ते को एक पैनकेक फेंक कर मारा और कहा, "चुप कर बेवकूफ कुत्ते! ऐसा बोल कि बूढ़े की बेटी की लाश आ रही है, और मेरी मार्फुशा की शादी बहुत अमीर घर में होगी।"
लेकिन कुत्ता फिर से भौंका, "भौ-भौ! बूढ़े की बेटी की गाड़ी सोने-चाँदी से भरी है, वह ज़िंदा और अमीर होकर लौट रही है!"
तभी घर का दरवाज़ा ज़ोर से खुला। सौतेली माँ और मार्फुशा की आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने नास्तेंका खड़ी थी। उसने बहुत ही कीमती फर का कोट पहना हुआ था और वह पहले से भी ज़्यादा सुंदर लग रही थी। उसके पीछे उसका बूढ़ा पिता खुशी से रोता हुआ एक बहुत बड़ा संदूक ला रहा था, जिसमें से सोने-चाँदी और हीरो की चमक बाहर आ रही थी।
पूरा घर उन कीमती खज़ानों से भर गया। बूढ़ा पिता अपनी बेटी को ज़िंदा और सुरक्षित पाकर बहुत खुश था। लेकिन सौतेली माँ और मार्फुशा का चेहरा जलन और लालच से काला पड़ गया।
"यह... यह सब तुम्हें कहाँ से मिला?" सौतेली माँ ने हकलाते हुए पूछा।
नास्तेंका ने उन्हें जंगल में मिले 'मोरोझको' दादाजी की पूरी कहानी सच-सच बता दी। कहानी सुनकर सौतेली माँ की आँखों में लालच की एक बुरी चमक आ गई। उसने सोचा कि अगर नास्तेंका को जंगल में रात बिताने के लिए इतना सारा खज़ाना मिल सकता है, तो उसकी अपनी बेटी मार्फुशा को तो इससे भी बड़ा खज़ाना मिलेगा।
उसने तुरंत फैसला किया कि वह अपनी बेटी मार्फुशा को भी मोरोझको के पास भेजेगी।
लालच ने सौतेली माँ की आँखों पर ऐसी पट्टी बाँध दी थी कि उसे भयानक ठंड का कोई अंदाज़ा नहीं रहा। उसने तुरंत अपनी सगी बेटी मार्फुशा को तैयार करना शुरू कर दिया। नास्तेंका को तो उसने फटे-पुराने कपड़ों में भेजा था, लेकिन मार्फुशा को उसने अपने घर के सबसे गर्म और मोटे ऊनी कपड़े पहनाए। उसके गले में मफलर लपेटा, हाथों में दास्ताने पहनाए और पैरों में मोटे जूते डाले। इतना ही नहीं, उसने मार्फुशा के लिए एक बड़ी सी टोकरी में भुना हुआ मांस, मीठे पैनकेक और गर्म पाई भी रख दी, ताकि जंगल में उसे भूख न लगे।
बुढ़िया ने अपने बूढ़े पति को धक्का देते हुए कहा, "जल्दी कर! मेरी बेटी को गाड़ी में बिठा और ठीक उसी देवदार के पेड़ के नीचे छोड़कर आ, जहाँ तूने नास्तेंका को छोड़ा था। मेरी मार्फुशा नास्तेंका से कहीं ज़्यादा खज़ाना लेकर लौटेगी।"
बूढ़ा आदमी कुछ नहीं बोल सका। उसने मार्फुशा को गाड़ी में बिठाया और उसे उसी घने और बर्फीले जंगल में ले गया। उसने मार्फुशा को उस विशाल देवदार के पेड़ के नीचे छोड़ दिया और वापस घर लौट आया।
मार्फुशा पेड़ के नीचे बैठ गई। नास्तेंका की तरह उसने शांति से इंतज़ार नहीं किया। उसने आते ही अपनी टोकरी खोली और ज़ोर-ज़ोर से चबाते हुए पैनकेक और मांस खाने लगी। "यह कैसा बेवकूफों वाला काम है," वह मुँह में खाना भरकर बड़बड़ाई। "इतनी ठंड में मुझे यहाँ बैठा दिया। पता नहीं वह खज़ाने वाला बूढ़ा कब आएगा! मुझे तो अभी से घर जाने की जल्दी हो रही है।"
तभी उसे पेड़ों की डालियों पर किसी के भारी कदमों की आवाज़ सुनाई दी। पेड़ों पर जमी बर्फ टूट-टूट कर नीचे गिरने लगी। 'मोरोझको' (फादर फ्रॉस्ट) एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँग लगाता हुआ वहाँ पहुँचा। उसने देखा कि नीचे एक लड़की बैठी है जो मोटे कपड़ों में लिपटी है और लगातार खा रही है।
मोरोझको पेड़ से नीचे उतरा। उसने अपनी जादुई बर्फीली हवा चलाई जिससे जंगल का तापमान तेज़ी से गिरने लगा।
वह मार्फुशा के पास आया और अपनी भारी आवाज़ में पूछा, "क्या तुम्हें ठंड लग रही है, मेरी बच्ची? क्या तुम गर्म हो?"
मार्फुशा ने झल्लाते हुए मोरोझको की तरफ देखा और बदतमीज़ी से बोली, "क्या तुम अंधे हो गए हो, बूढ़े? तुम्हें दिखाई नहीं देता कि मेरे हाथ-पैर जम रहे हैं? मुझसे फालतू के सवाल मत पूछो। जल्दी से मुझे हीरे-जवाहरात और सोने से भरा संदूक दो, ताकि मैं यहाँ से जाऊँ!"
मोरोझको को यह सुनकर बहुत अजीब लगा। उसने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा और ठंड को और ज़्यादा बढ़ा दिया। बर्फीली हवाएँ चीखने लगीं और पेड़ों की डालियाँ जम कर पत्थर जैसी हो गईं।
उसने मार्फुशा के और करीब आकर पूछा, "क्या अब तुम्हें ठंड लग रही है, लड़की? क्या तुम अब गर्म हो?"
मार्फुशा गुस्से से लाल हो गई। उसने चीखते हुए कहा, "चुप कर बुड्ढे! मेरी हड्डियाँ काँप रही हैं और तू यहाँ खड़े होकर बकवास कर रहा है। जा और मेरा खज़ाना लेकर आ, वरना मैं अपनी माँ से कहकर तुझे पिटवा दूँगी!"
मोरोझको की आँखें क्रोध से नीली चमकने लगीं। उसने कभी किसी इंसान का इतना अहंकार और लालच नहीं देखा था। उसने तुरंत एक भयंकर बर्फीला तूफान खड़ा कर दिया। हवा इतनी तेज़ हो गई कि मार्फुशा की टोकरी उड़ गई। बर्फ के टुकड़े चाकू की तरह बरसने लगे।
मोरोझको ने आखिरी बार पूछा, "क्या अब तुम गर्म हो?"
लेकिन इस बार मार्फुशा ने कुछ नहीं कहा। वह गालियाँ देते-देते ही बर्फ की एक मूर्ति में बदल चुकी थी। उसका घमंड, उसका लालच और उसका शरीर सब कुछ उस भयानक ठंड में हमेशा के लिए जम चुका था। मोरोझको ने उसे वहीं छोड़ दिया और जंगल के अंधेरे में गायब हो गया।
अगली सुबह गाँव में सौतेली माँ खुशी से पागल हो रही थी। उसने पूरे घर की सफाई की थी और खज़ाना रखने के लिए जगह बना रही थी। उसने अपने पति से कहा, "जाओ, जल्दी से गाड़ी लेकर जाओ! मेरी मार्फुशा आ रही होगी। देखना, वह नास्तेंका से दोगुना बड़ा संदूक लेकर आएगी।"
बूढ़ा आदमी अपनी गाड़ी लेकर जंगल की ओर निकल गया।
बुढ़िया और नास्तेंका घर पर थे। घर के बाहर बैठा कुत्ता फिर से ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा।
"भौ-भौ! बूढ़े की बेटी तो राज करेगी, पर बुढ़िया की बेटी हड्डियों का ढाँचा बनकर लौट रही है! भौ-भौ!"
बुढ़िया को यह सुनकर भयंकर गुस्सा आया। उसने कुत्ते की तरफ एक डंडा फेंक कर मारा। "चुप कर मनहूस कुत्ते! तुझे कुछ नहीं पता। ऐसे बोल कि बुढ़िया की बेटी सोने और मोतियों से लदी हुई आ रही है।"
लेकिन कुत्ते ने डंडे से बचकर फिर से भौंकना शुरू कर दिया, "भौ-भौ! बुढ़िया की बेटी जम गई है! गाड़ी में सिर्फ उसकी लाश आ रही है!"
तभी घर के बाहर गाड़ी के पहियों की आवाज़ आई। बुढ़िया खुशी से दरवाज़े की तरफ भागी। "आ गई! मेरी बेटी खज़ाना लेकर आ गई!"
लेकिन जैसे ही उसने गाड़ी का पर्दा उठाया, उसके होश उड़ गए। गाड़ी में कोई खज़ाना नहीं था। उसमें सिर्फ मार्फुशा का जमा हुआ, पत्थर जैसा शरीर रखा था। उसके चेहरे पर लालच और गुस्से के भाव उसी तरह जमे हुए थे।
बुढ़िया ज़ोर-ज़ोर से छाती पीटकर रोने लगी। वह ज़मीन पर गिर पड़ी और अपने बाल नोंचने लगी। उसे समझ आ गया था कि नास्तेंका को घर से निकालने की उसकी क्रूरता और खज़ाने के उसके लालच ने ही उसकी सगी बेटी की जान ले ली है। लेकिन अब पछताने से कोई फायदा नहीं था।
कुछ समय बाद, गाँव के एक बहुत ही नेक और अमीर नौजवान ने नास्तेंका की सुंदरता और दयालुता के बारे में सुना। वह नास्तेंका के पास रिश्ते का प्रस्ताव लेकर आया। नास्तेंका की शादी बहुत ही धूमधाम से हुई। वह मोरोझको दादाजी के दिए हुए खज़ाने और अपने अच्छे स्वभाव के साथ अपने नए घर में हमेशा के लिए खुशी-खुशी रहने लगी।
दूसरी ओर, लालची बुढ़िया अपनी बेटी के गम में अकेले रोती रही, और यही उसके बुरे कर्मों की सबसे बड़ी सज़ा थी।
संस्कृति की झलक (Cultural Background):
'मोरोझको' (Morozko) को स्लाविक और रूसी लोक कथाओं में 'फादर फ्रॉस्ट' (Father Frost) या 'डेड मोरोज़' (Ded Moroz) के नाम से जाना जाता है। वे प्रकृति की एक शक्तिशाली ताकत हैं, जो अच्छे और संस्कारी लोगों की मदद करते हैं और लालची या अभिमानी लोगों को सज़ा देते हैं। यह कथा मुख्य रूप से रूसी ग्रामीण जीवन की कठोर सर्दियों और उस दौरान जीवित रहने के संघर्ष को दर्शाती है, जहाँ विनम्रता और सम्मान ही बचने का एकमात्र रास्ता माना जाता था।
कहानी से सीख (Moral of the Story):
लालच और ईर्ष्या का फल हमेशा विनाशकारी होता है। बुरा व्यवहार और अहंकार मुसीबत के समय स्थिति को और बिगाड़ देते हैं। इसके विपरीत, विनम्रता, धैर्य और दयालुता बड़े से बड़े संकट को भी आशीर्वाद में बदल सकती है।
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