प्राचीन फारस (Persia) का विशाल 'बेहिस्तून' पर्वत। भोर का धुंधला उजाला पहाड़ की चोटियों से टकरा रहा है। चारों ओर सन्नाटा है, जिसे केवल एक छेनी और हथौड़े की 'ठक-ठक' की आवाज़ तोड़ रही है। पर्वत की ऊँची ढलानों पर एक शख्स, जिसके शरीर की मांसपेशियाँ पत्थर की तरह सख्त हो चुकी हैं और पसीने से तर-बतर हैं, पहाड़ को तराश रहा है। यह फरहाद है। उसके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि एक रूहानी चमक है। वह पत्थर को ऐसे काट रहा है जैसे वह मोम हो। पहाड़ की गोद में उसने अपनी महबूबा 'शिरीं' की विशाल आकृतियाँ उकेरी हैं। हवा में उड़ती धूल के बीच, वह अपनी आखिरी ताकत झोंक रहा है ताकि वह उस वादे को पूरा कर सके जो उसने सत्ता के नशे में चूर बादशाह से किया था।
अध्याय 1: एक मूर्तिकार का हुनर और शहजादी की नज़र
फारस के इतिहास में बादशाह खुसरो परवेज का नाम उसके वैभव के लिए जाना जाता था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी दौलत उसकी मलिका 'शिरीं' थी। शिरीं केवल सुंदर नहीं थी, वह कला की पारखी भी थी। उसे अपने महल के लिए एक ऐसी नहर चाहिए थी जो पहाड़ों के दूसरी पार से ताज़ा दूध लेकर आए। इस असंभव कार्य के लिए साम्राज्य के सबसे महान वास्तुकार और मूर्तिकार 'फरहाद' को बुलाया गया।
फरहाद जब दरबार में पहुँचा, तो उसने पहली बार शिरीं को देखा। वह सौंदर्य की वह मूरत थी जिसे पत्थरों में कैद करना भी मुश्किल था। फरहाद का दिल अपनी जगह छोड़ चुका था। वह जानता था कि एक मामूली कलाकार का शहजादी से प्यार करना मौत को दावत देना है, लेकिन कला और प्रेम दोनों ही तर्क नहीं मानते। फरहाद ने काम स्वीकार कर लिया, इस शर्त पर कि यदि उसने पहाड़ चीरकर दूध की नहर बहा दी, तो बादशाह को उसे कुछ देना होगा। बादशाह खुसरो ने अपनी ईर्ष्या और अहंकार में आकर वादा कर दिया कि अगर फरहाद सफल हुआ, तो वह शिरीं को उसे सौंप देगा।
अध्याय 2: बेहिस्तून पर्वत और फरहाद की तपस्या
फरहाद ने बेहिस्तून के पहाड़ को अपना घर बना लिया। वह दिन-रात पत्थरों से लड़ता। उसका हर वार पत्थर पर नहीं, बल्कि उन बाधाओं पर था जो उसे शिरीं से दूर रख रही थीं। लोग उसे 'दीवाना' कहने लगे। जैसे-जैसे समय बीता, फरहाद ने पहाड़ की चट्टानों पर शिरीं की हज़ारों मूर्तियाँ बना डालीं। वह पत्थरों से बातें करता और उनसे अपनी व्यथा कहता।
बादशाह खुसरो को उम्मीद थी कि फरहाद हार मान लेगा, लेकिन फरहाद का जुनून बढ़ता गया। उसने अपनी छेनी से पहाड़ का सीना इस तरह चीरा कि मीलों लंबी एक नहर तैयार होने लगी। यह केवल इंजीनियरिंग का चमत्कार नहीं था, यह इश्क की वह ताकत थी जो प्रकृति के नियमों को चुनौती दे रही थी।
अध्याय 3: फरहाद का अंतिम संकल्प (Final Vow)
नहर का काम लगभग पूरा होने वाला था। फरहाद के हाथ जख्मी थे, लेकिन उसका संकल्प हिमालय से भी ऊँचा था। उसने अपनी छेनी से एक समतल पत्थर पर शिरीं के लिए अपना आखिरी संदेश उकेरा, जिसे वह आखिरी बार पहाड़ के उस पार भेजने वाला था।
"मेरी रूह की रोशनी, शहजादी शिरीं,
आज जब मैं बेहिस्तून की आखिरी चट्टान को देख रहा हूँ, तो मुझे इसमें पत्थर नहीं, बल्कि तुम्हारा चेहरा नजर आ रहा है। लोग कहते हैं कि पहाड़ को काटना असंभव है, लेकिन वे नहीं जानते कि तुम्हारी एक मुस्कान की याद में मैंने इस विशाल पर्वत को भी मोम बना दिया है। मेरे हाथों से बहता खून इन पत्थरों को रंग रहा है, ताकि आने वाली नस्लें देख सकें कि प्यार में कितनी ताकत होती है।
कल जब सूरज की पहली किरण इस घाटी में उतरेगी, तो दूध की वह नहर तुम्हारे कदमों तक पहुँचेगी। यह मेरा संकल्प है कि मैं सत्ता के अहंकार को इस छेनी के नीचे झुका दूँ। बादशाह ने शर्त रखी थी कि पत्थर जीतेंगे या मैं। आज पत्थर हार गए हैं और मेरा प्रेम जीत रहा है। मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकता। कल का दिन केवल दूध की नहर का नहीं, बल्कि हमारी रूहों के मिलन का दिन होगा। अगर यह पहाड़ मेरा कफ़न भी बन जाए, तो भी इसके हर ज़र्रे से तुम्हारा ही नाम गूँजेगा।"
अध्याय 4: दूध की नहर और बादशाह का छल
अगली सुबह, वेरोना से भी अधिक सुंदर चमत्कार फारस में हुआ। पहाड़ का सीना चीरकर सफेद दूध की एक शीतल नहर बहती हुई शिरीं के महल के आँगन तक पहुँच गई। पूरा फारस स्तब्ध था। एक साधारण इंसान ने कुदरत को हरा दिया था।
बादशाह खुसरो घबरा गया। उसे अपना सिंहासन डोलता नज़र आया। वह जानता था कि अगर वह अपना वादा तोड़ता है, तो इतिहास उसे कभी माफ नहीं करेगा, और अगर वादा निभाता है, तो वह शिरीं को खो देगा। उसने अपनी मक्कारी का सहारा लिया। उसने एक बुढ़िया को फरहाद के पास भेजा। बुढ़िया ने पहाड़ पर पहुँचकर ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। फरहाद ने जब कारण पूछा, तो उसने वह झूठ बोला जिसने ब्रह्मांड को हिला दिया— "फरहाद, तू यहाँ पत्थर काट रहा है और वहां शहजादी शिरीं की मौत हो गई है।"
अध्याय 5: अंतिम प्रहार और नियति का विश्वासघात
जैसे ही फरहाद ने यह सुना, उसके हाथ से वह छेनी गिर गई जिससे उसने पहाड़ को जीता था। उसके लिए दुनिया का कोई अर्थ नहीं रहा। अगर शिरीं ही नहीं रही, तो यह नहर, यह जीत और यह जीवन सब व्यर्थ था।
उसने अपना भारी हथौड़ा उठाया और उसे अपने ही सिर पर दे मारा। उसका खून उस दूध की नहर में मिल गया जिसे उसने अपनी मेहनत से बनाया था। फरहाद ने पहाड़ की गोद में दम तोड़ दिया। जब यह खबर शिरीं तक पहुँचे, तो वह नंगे पाँव पहाड़ की ओर दौड़ी। वहाँ अपने प्रेमी का बेजान शरीर देखकर उसका दिल फट गया। उसने वही छेनी उठाई और अपनी जान दे दी।
3. संस्कृति की झलक (Cultural Background):
यह कहानी 7वीं शताब्दी के फारस के ससानिद साम्राज्य (Sassanid Empire) के समय की है। यह कहानी 'निज़ामी गंजवी' की अमर कृति 'खुसरो-शिरीं' का हिस्सा है। फारसी संस्कृति में फरहाद को एक 'कोहकन' (Pahad-Todne-Wala) के रूप में पूजा जाता है, जो मेहनत और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है। बेहिस्तून पर्वत आज भी ईरान में मौजूद है, जो इस कहानी की ऐतिहासिकता को बल देता है।
कहानी से सीख (Moral of the Story):
शिरीं-फरहाद की दास्तान सिखाती है कि सत्ता और छल थोड़े समय के लिए जीत सकते हैं, लेकिन सच्चा प्रेम अमर हो जाता है। फरहाद का पुरुषार्थ आज भी उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो मानते हैं कि दृढ़ निश्चय से पहाड़ों का रास्ता भी बदला जा सकता है।
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